Thursday, 27 March 2025

आज मेरे मन की बात।

आज मेरे मन की बात।

हम और आप मित्र  जो सभी पढे-लिखे हैं या वो जो बहुत ही ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, से बात करना चाहूंगा । जिससे पहले यह भी बताना जरूरी समझता हूं कि  मैं स्वंय स्कूल के हिसाब से इतना पढ़ा नहीं हूं कि कोई डिग्री या सर्टिफिकेट की मार्कशीट दिखा सकूँ ।

पर इतना जरूर है कि बिना रेगुलर स्कूल गए, शुरू शरू में डेली न्यूज़ पेपर का संडे संस्करण से आरम्भ हो कर फर्स्ट पेज, कार्टून कॉमिक्स तक रुचि बनी।, किशोरावस्था में आ हिंदी-पंजाबी नावेल, मैगज़ीन, धार्मिक  पुस्तकालय का इंचार्ज होते ही हिंदी व पंजाबी साहित्य की ओर झुका।

 जब निष्काम पंजाबी हिंदी अक्षरमाला का टीचर हुआ तो दोनों भाषाओं की व्याकरण योग्यता का विद्यार्थी और अब पचास वर्ष की उम्र से चलकर शेष तक के सफर में इंग्लिश को बारीकी से समझने के लिये इंग्लिश ग्रामर को ओर बढ़ने लगा हूं। जिसको भी आज आठ साल हो चुके हैं फिर भी 50-60% तक की एवरेज ही बना सका हूं।

 कुल मिलाकर समझ लीजिए कि सीखने के इलावा जिंदगी में कुछ नहीं किया है। कोशिश करता हूँ  कुछ न कुछ सीखता ही रहूं व उन्हें बांट सकूँ। और उत्सुक भी रहता हूं कि कोई इसे पढ़े।  पर जिस हिसाब से लाइक अथवा कमैंट्स आती हैं, उससे लगता नहीं कि मेरी लेखनी में या उन विषयों में कोई अधिक दिलचस्पी लेता हो जिसका मैं आदी हो चला हूँ। 

कोई  हितेषी कारण भी नहीं बताता कि मेरी लेखनी में त्रुटि क्या क्या हैं जो कोशिश कर सकूँ उसे सुधारने की।  एक बार मेरी एक दो महिला मित्रों ने कहा भी था कि इस का कारण मेरे लिखे वाक्य में फुल स्टॉप चार-पांच लाइनों के बाद आता है व व्याकरण के हिसाब से वाक्यों में संज्ञा क्रिया ऑब्जेक्ट इत्यादि के जो नियम है उसके उलट मेरी शैली है। व लेख काफी लंबा हो जाता है कि दिलचस्पी पढते पढ़ते कम हो जाती है

जिसे मैंने माना भी और विचार भी किया पर आदतन सुधार नहीं पाया पर कोशिश जरूर करूँगा। इस कमी का कारण यह भी हो सकता है कि इस विषय का मेरा कोई व्याकरण विषय का शिक्षक नहीं रहा है जो तरतीब से लिखना सिखा दे।

दूसरी कमी जो मुझे अपने में लगती है कि मुझे जब तक कोई विषय न दे तो मुझसे कुछ लिखा नहीं जाता। उसके लिए मुझे किसी और की पोस्ट सर्च करनी पड़ती है तो उस पर मेरा जो कमेंट बनता है उसी को मैं अपना विषय बना लेता हूँ और जब तक कोई मेरे काम में कुछ रुकावट  बने तो विषय से भटक जाता हूँ, तब उस लेख का कोई स्टॉपेज नहीं आता। यदि रुकावट न बनी तो वहीं फुल स्टॉप लग जाता है।

यहीं देखिए, कि अभी जिस विषय पर चर्चा करने को मैंने नोटबुक खोली थी वो न जाने किस ओर गया। आजकल इंग्लिश ग्रामर का विषय है जिसको सीखने में मैंने अपना दिन रात एक कर रखा है । अब वो टॉपिक कल पर छोड़ना पड़ेगा । पहले  आज देखते हैं कि अब की लिखी इस पोस्ट पर रुचि कितनों को कितनी रुचि जागी । उसके लिए मुझे चौबीस घन्टे लाइक वाले व कमैंट्स बॉक्स में कंटिन्यू अथवा प्रोसीड लिखने पर नज़र रखनी होगी।

#Seriously

Today my mind


 We and you friends who are all educated or those who are highly educated, would like to talk to them.  Before that I also consider it necessary to tell that I myself am not educated enough according to the school that I can show the mark sheet of any degree or certificate.


 But it is sure that without going to regular school, in the beginning, starting from the Sunday edition of the daily newspaper, the first page, cartoon comics became interested. Hindi-Punjabi novel came in adolescence, Hindi as soon as he was in charge of the magazine, religious library  And inclined towards Punjabi literature.


 When Nishkam became a teacher of Punjabi Hindi Aksharmala, then a student of grammar ability of both languages ​​and now from the age of fifty years till the end of the journey, I have started moving towards English Grammar to understand English closely.  Whichever has been eight years today, still I have been able to make an average of 50-60% only.


 Overall, understand that you have done nothing in life except learning.  I try to keep learning something or the other and share it.  And I am also curious that someone should read it.  But according to the number of likes or comments that come, it doesn't seem that anyone is more interested in my writings or in the subjects to which I have become addicted.

No benevolent reason even tells what are the errors in my writing that I can try to rectify.  Once one or two of my female friends had also said that the reason for this is that the full stop comes after four-five lines in my written sentences and according to grammar, my style is contrary to the rules of noun verb object etc. in sentences.  And the article becomes so long that the interest decreases while reading it.


 Which I accepted and thought about but could not improve habitually but will definitely try.  The reason for this deficiency may also be that I have not had any grammar teacher of this subject who can teach me to write in an orderly manner.


 The second shortcoming that I find in myself is that unless someone gives me a subject, I cannot write anything.  For that, I have to search someone else's post, then I make my comment on it as my subject, and as long as there is some obstacle in my work, I deviate from the subject, then there is a stoppage of that article.  Does not know  If there is no obstruction, then there is a full stop.


 Look right here, don't know where the topic on which I had opened the notebook to discuss has gone.  Nowadays it is the subject of English Grammar, in learning which I have devoted my whole day and night.  Now that topic will have to be left for tomorrow.  First let's see how many people got interested in this post written today.  For that, I have to keep an eye on writing continue or proceed in likes and comments box for twenty four hours.


 #seriously


ਸੁਣਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਚਿੰਤਾ ਆਪਣੀ ਅਤੇ ਆਪਣੀਆਂ ਦੀ ਬਿਮਾਰੀ ਅਰ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬੱਚਣ ਨੂੰ ਬੇਬਸ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। 

ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਜੋ ਜਾ ਚੁੱਕੇ ਹਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਆਈ ਨੂੰ ਕਿਸ ਬੇਬਸੀ ਨਾਲ ਬਿਤਾ ਕੇ ਗਏ ਹੋਣਗੇ।

ਮੈਂ ਇਸ ਵਾਰਤਾਲਾਪ ਵਿੱਚ ਕਿਸੀ ਅਚਣਚੇਤ ਆਈ ਬਿਮਾਰੀ ਜਾਂ ਮੌਤ ਦਾ ਜ਼ਿਕਰ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਿਹਾ।

 ਜੋ ਸੁਭਾਵਕ ਆਉਣਾ ਹੈ ਜਾਂ ਆਏਗਾ ਉਸ ਤੋਂ ਇਹ ਸੌਚ ਬਣੀ ਹੈ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਇਹ ਜੋ ਮਹਾਮਾਰੀ ਵਾਲੀ ਬਿਮਾਰੀ ਆਈ ਹੈ, ਇਹੋ ਜਿਹੀ ਸ਼ਾਇਦ ਹੀ ਸਾਡੇ ਪੁਰਾਤਨ ਸਮੇਂ ਦੇ ਪ੍ਰਾਣੀ ਉਪਰ ਆਈ ਹੋਵੇਗੀ ਕਿ ਜੋ ਨ ਅਚਨਚੇਤ ਹੈ ਨ ਸਾਡੇ ਸ਼ਰੀਰ ਦੇ ਰੱਖ ਰਖਾਵ ਵਿੱਚ ਸਾਡੇ ਵਲੋਂ ਕਿਸੀ ਲਾਪਰਵਾਹੀ ਕਰਕੇ ਹੈ ਜੋ ਦੋਸ਼ ਕਰਮਾਂ ਨੂੰ ਜਾਂ ਜੀਵਨ ਜਿਊਣ ਦੇ ਕਿਸੇ ਤਰੀਕੇ ਨੂੰ ਨ ਅਪਨਾਉਣ ਕਰਕੇ ਹੈ।

ਇਸ ਆਈ ਮਹਾ ਬਿਮਾਰੀ ਨੂੰ ਸੁਭਾਵਿਕ ਨ ਕਹਿ ਕੇ ਸਾਮੂਹਿਕ ਕਹਿਣਾ ਬੇਹਤਰ ਹੋਏਗਾ। ਜਿਸਨੂੰ ਭੁਗਤਦਿਆਂ ਸਾਲ ਤੋਂ ਉਪਰ ਹੋ ਚਲਿਆ ਹੈ। ਪਹਿਲਾਂ ਉਹ ਥਾਂ ਲੱਭੀ, ਫਿਰ ਕਾਰਣ ਜਾਣਿਆ ਗਿਆ, ਫਿਰ ਲੱਭੀ ਗਈ ਦਵਾਈ। ਫਿਰ ਆਈਆਂ ਮੁਸ਼ਕਿਲਾਂ ਇਸ ਦਵਾਈ ਦਾ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਚਾਰ ਅਤੇ ਤਸੱਲੀ ਕਰਵਾਉਣ ਦੀ।

ਚਲੋ, ਉਹ ਵੀ ਹੋ ਗਈ। ਫਿਰ ਜਰੂਰਤਾਂ ਪਹਿ ਗਈਆਂ ਇਸਦੇ ਵਾਇਰਸ ਨੂੰ ਰੋਕਣ, ਲਈ ਹਸਪਤਾਲਾਂ ਅਤੇ ਉਸਦੀ ਮਸ਼ੀਨਰੀ ਦੀ ਮਾਤਰਾ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਣ ਦੀ। ਕੁਲ ਮਿਲਾਕੇ ਹਾਲੀਂ ਪਰੋਸੀਜ਼ਰ  ਚਾਲੂ ਹੈ।

ਇਸ ਦਰਮਿਆਨ ਆਈਆਂ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਮਜਬੂਰੀਆਂ।
Cont....

Seriously

स्वाभाविक



ऐसा लगना स्वाभाविक हो सकता है जब हम अपने जीवन, अपने कर्मों, या अपनी गलतियों पर गहराई से सोचते हैं। ये एक तरह का आत्म-मंथन है, जहां हम खुद को कठघरे में खड़ा पाते हैं। शायद ये इसलिए भी होता है क्योंकि हम अपने भीतर की सच्चाई से रूबरू होने की कोशिश कर रहे होते हैं। क्या आपको लगता है कि कोई खास वजह है जो आपको इस भावना की ओर ले जा रही है? अगर आप इसके बारे में बात करना चाहें, तो मैं सुनने के लिए हूं।
परिवार में सुलह कराना आसान नहीं होता, खासकर जब जिद और पुरानी खटास रिश्तों में गहरे तक पैठ बना ले। लेकिन कुछ तरीके हैं जो धीरे-धीरे रास्ता बना सकते हैं। आपकी स्थिति में, जहां बेटा-बहू के बीच अनबन है और दादा-पोते का रिश्ता भी प्रभावित हुआ है, इन पर विचार कर सकते हैं:

1. **निष्पक्ष संवाद शुरू करना**: सबसे पहले, दोनों पक्षों से अलग-अलग बात करें। उनकी सुनें, बिना पक्ष लिए। शायद आप एक मध्यस्थ की भूमिका निभा सकें। पूछें कि उनकी नजर में समस्या की जड़ क्या है। कई बार लोग बस ये चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए।

2. **छोटे कदम उठाएं**: सीधे बड़ी सुलह की उम्मीद न करें। पहले छोटी-छोटी मुलाकातें करवाने की कोशिश करें, जैसे किसी तटस्थ जगह पर, बिना बहस के माहौल के। पोते को बहाना बनाकर दोनों को एक साथ लाने की कोशिश भी हो सकती है, क्योंकि बच्चे अक्सर रिश्तों को जोड़ने का सेतु बनते हैं।

3. **पोते की भावनाओं का सहारा लें**: अगर पोता दादा से मिलने को तरस रहा है, तो उसकी ये इच्छा बेटे-बहू को बता सकते हैं। भावनात्मक अपील कभी-कभी जिद को पिघला देती है। कह सकते हैं, "वो तुम दोनों से कुछ नहीं मांग रहा, बस अपने दादा को देखना चाहता है।"

4. **पुरानी बातों को दफन करने की सलाह**: दोनों को समझाएं कि 6 साल पुरानी बातों को पकड़े रहने से सिर्फ नुकसान हो रहा है। पूछें कि क्या वो आगे बढ़ना चाहते हैं, या यूं ही दुख में रहना पसंद करेंगे। इसे प्यार से, लेकिन साफ कहें।

5. **किसी बाहरी मदद का सहारा**: अगर आपकी बात नहीं मानते, तो परिवार का कोई सम्मानित सदस्य, दोस्त, या फिर प्रोफेशनल मध्यस्थ (जैसे काउंसलर) मदद कर सकता है। बाहरी व्यक्ति कभी-कभी नई नजर देता है।

6. **धैर्य और प्रार्थना**: बदलाव में वक्त लगता है। आप अपनी तरफ से कोशिश करें, लेकिन ये भी मानें कि हर इंसान का अपना समय होता है मन बदलने का। अगर आप आध्यात्मिक हैं, तो मन की शांति के लिए प्रार्थना भी मदद कर सकती है।

क्या इनमें से कोई तरीका ऐसा लगता है जो आपकी स्थिति में काम कर सकता हो? या फिर कोई और खास बात है जो इनके बीच की जिद को समझने में मदद करे?
https://www.facebook.com/100034966611608/posts/pfbid0egVuUHTCojLo5bf7x9qP366xan6eggoa7WNDNgVoHLQmBW5oC24X4Nvj2Szodp6Nl/?app=fbl

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ऐसा लगना स्वाभाविक हो सकता है जब हम अपने जीवन, अपने कर्मों, या अपनी गलतियों पर गहराई से सोचते हैं। ये एक तरह का आत्म-मंथन है, जहां हम खुद को कठघरे में खड़ा पाते हैं। शायद ये इसलिए भी होता है क्योंकि हम अपने भीतर की सच्चाई से रूबरू होने की कोशिश कर रहे होते हैं। क्या आपको लगता है कि कोई खास वजह है जो आपको इस भावना की ओर ले जा रही है? अगर आप इसके बारे में बात करना चाहें, तो मैं सुनने के लिए हूं।
परिवार में सुलह कराना आसान नहीं होता, खासकर जब जिद और पुरानी खटास रिश्तों में गहरे तक पैठ बना ले। लेकिन कुछ तरीके हैं जो धीरे-धीरे रास्ता बना सकते हैं। आपकी स्थिति में, जहां बेटा-बहू के बीच अनबन है और दादा-पोते का रिश्ता भी प्रभावित हुआ है, इन पर विचार कर सकते हैं:

1. **निष्पक्ष संवाद शुरू करना**: सबसे पहले, दोनों पक्षों से अलग-अलग बात करें। उनकी सुनें, बिना पक्ष लिए। शायद आप एक मध्यस्थ की भूमिका निभा सकें। पूछें कि उनकी नजर में समस्या की जड़ क्या है। कई बार लोग बस ये चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए।

2. **छोटे कदम उठाएं**: सीधे बड़ी सुलह की उम्मीद न करें। पहले छोटी-छोटी मुलाकातें करवाने की कोशिश करें, जैसे किसी तटस्थ जगह पर, बिना बहस के माहौल के। पोते को बहाना बनाकर दोनों को एक साथ लाने की कोशिश भी हो सकती है, क्योंकि बच्चे अक्सर रिश्तों को जोड़ने का सेतु बनते हैं।

3. **पोते की भावनाओं का सहारा लें**: अगर पोता दादा से मिलने को तरस रहा है, तो उसकी ये इच्छा बेटे-बहू को बता सकते हैं। भावनात्मक अपील कभी-कभी जिद को पिघला देती है। कह सकते हैं, "वो तुम दोनों से कुछ नहीं मांग रहा, बस अपने दादा को देखना चाहता है।"

4. **पुरानी बातों को दफन करने की सलाह**: दोनों को समझाएं कि 6 साल पुरानी बातों को पकड़े रहने से सिर्फ नुकसान हो रहा है। पूछें कि क्या वो आगे बढ़ना चाहते हैं, या यूं ही दुख में रहना पसंद करेंगे। इसे प्यार से, लेकिन साफ कहें।

5. **किसी बाहरी मदद का सहारा**: अगर आपकी बात नहीं मानते, तो परिवार का कोई सम्मानित सदस्य, दोस्त, या फिर प्रोफेशनल मध्यस्थ (जैसे काउंसलर) मदद कर सकता है। बाहरी व्यक्ति कभी-कभी नई नजर देता है।

6. **धैर्य और प्रार्थना**: बदलाव में वक्त लगता है। आप अपनी तरफ से कोशिश करें, लेकिन ये भी मानें कि हर इंसान का अपना समय होता है मन बदलने का। अगर आप आध्यात्मिक हैं, तो मन की शांति के लिए प्रार्थना भी मदद कर सकती है।

क्या इनमें से कोई तरीका ऐसा लगता है जो आपकी स्थिति में काम कर सकता हो? या फिर कोई और खास बात है जो इनके बीच की जिद को समझने में मदद करे?
https://www.facebook.com/100034966611608/posts/pfbid0egVuUHTCojLo5bf7x9qP366xan6eggoa7WNDNgVoHLQmBW5oC24X4Nvj2Szodp6Nl/?app=fbl

Tuesday, 18 March 2025

हम उम्र

क्या हम उम्र के मित्र खुश नसीब नहीं हैं जो इस वर्तमान समय काल में इस दुनिया में आए?
वैज्ञानिक समय से सोचें तो पहली बात में तथ्य है कि किस्मत से मां बाप के खून में बसे तथा  मिले करोड़ों अणुओं में से जो अणु हैं उन्हें अब तक के जन्मे  सभी मनुष्यों  में हम भी हैं।
अभी तक की खोज जो ब्रह्मांड से हुई है, उनमें औरों जीव जंतुओं  में से जो सोचने समझने वाली शक्ति प्रकृति के सहयोग द्वारा मिली है उसके हम हिस्सेदार है। फिर जो जीवनशैली हमें मिली है उसके क्रिएटर को जीने , जिसे पीड़ी  भी कहा जाता है, साधने में हमारा साथ प्रकृति ने उसी के द्वारा बताए ज्ञान की खोज से संभव हुआ। जबकि हमारे पुरखों  से ये  सब मेहनत  को सफलता तो मिली परंतु आज के मुकाबले बहुत ढीली थी । तब के टाइम में न बिजली थी न स्वच्छ पानी। 
कम्प्यूटर युग की तो दूर की बात थी । जिन प्राकृतिक धातुओं का प्रयोग हुआ उसमें समानता तो थी या है, उसको खोज कर मॉडिफाई करना मनुष्य के 
पढ़े लिखे दिमाग की फितरत है। जिससे हमें इतना जल्दी कम समय में सफलता मिली।
आज का समय वह है कि जब कोई नए मॉडल की मशीनरी या वस्तु व मेडिकल इलाज  दिन ब दिन आधुनिक होते जा रहे हैं । कोई दिन ऐसा नहीं निकलता जब  नया कुछ न दिख जाए।  मशीन रिपेयरिंग का काम बहुत कम हो गया है। हर कोई कुछ नया मांगता है। 
इस तरक्की के साथ  आपसी मिलना  लगभग समाप्त हो चला है  । कुछ पड़ चुकी गलत आदतों से बचना जरूरी नहीं हुआ है?

Sunday, 16 March 2025

शिक्षक

माता पिता द्वारा किए पालन पोषण के साथ मिली ज्ञानवर्धक शिक्षा में जो समाजिक माहौल देने वाला शिक्षक ही गुरु कहलाता है । यह ही एक रिश्ता है जो हमें हर समाज का  मार्ग दर्शन देता है। जो पूजनीय तो है  ही साथ में जिंदगी के उतार चढ़ाव, सुख दुख में ठहराव  की तसल्ली देता है कि कैसे सच्चा रहा जाए, कैसे नियमों का पालन करें
माता-पिता के पालन-पोषण के बाद, एक शिक्षक ही होता है जो हमें ज्ञान और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा देता है। गुरु का स्थान हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है।
गुरु का महत्व:
 * मार्गदर्शन: गुरु हमें सही मार्ग दिखाते हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करते हैं।
 * ज्ञान का प्रकाश: गुरु हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।
 * मूल्यों की शिक्षा: गुरु हमें नैतिक मूल्यों, जैसे सत्य, ईमानदारी और न्याय, की शिक्षा देते हैं।
 * प्रेरणा: गुरु हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं और हमें कभी हार न मानने की सीख देते हैं।
 * समर्थन: गुरु हमारे सुख-दुख में हमेशा हमारे साथ खड़े रहते हैं और हमें सहारा देते हैं।
गुरु-शिष्य का संबंध:
गुरु-शिष्य का संबंध बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण होता है। यह संबंध केवल ज्ञान के आदान-प्रदान तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें आपसी सम्मान, विश्वास और प्रेम भी शामिल होता है।
गुरु का सम्मान:
हमें हमेशा अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए और उनकी शिक्षाओं का पालन करना चाहिए। गुरु का आशीर्वाद हमारे जीवन को सफल और समृद्ध बना सकता है।

Saturday, 15 March 2025

चाटुकारिता

आपकी बात बिल्कुल सही है। चाटुकारिता, जिसे आम बोलचाल की भाषा में चमचागिरी भी कहा जाता है, एक ऐसा विषय है जो समाज में अक्सर चर्चा का विषय बना रहता है। यह एक ऐसा तरीका है जिससे लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बड़े और प्रभावशाली लोगों की झूठी प्रशंसा करते हैं।
चाटुकारिता के कुछ प्रमुख पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है:
 * परिभाषा: चाटुकारिता का अर्थ है किसी व्यक्ति की झूठी प्रशंसा करके उसे खुश करना और उससे अपना काम निकलवाना।
 * उद्देश्य: चाटुकारिता का मुख्य उद्देश्य होता है किसी बड़े व्यक्ति का विश्वास जीतना और उससे अपने व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करना।
 * तरीके: चाटुकार अक्सर बड़े लोगों के हर काम की तारीफ करते हैं, उनके विरोधियों की निंदा करते हैं, और उनके घरेलू काम करने में भी नहीं हिचकिचाते।
 * प्रभाव: चाटुकारिता से ईमानदार और मेहनती लोगों को नुकसान पहुंचता है, क्योंकि चाटुकार उनकी सफलता में बाधा डालते हैं।
 * उदाहरण: चाटुकारिता राजनीति, व्यवसाय, और सरकारी कार्यालयों में आम है। बड़े नेता, अधिकारी, और व्यापारी अक्सर चाटुकारों से घिरे रहते हैं।
 * नकारात्मक प्रभाव: चाटुकारिता समाज में असमानता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। यह योग्यता और मेहनत की जगह चापलूसी को महत्व देती है।
चाटुकारिता एक नकारात्मक प्रवृत्ति है जो समाज के लिए हानिकारक है। हमें ईमानदार और मेहनती लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए, और चाटुकारों से दूर रहना चाहिए।

Sunday, 9 March 2025

आर्टिकल

सर्व शक्तिमान जो एक शक्ति है जिसे लोग भगवान कहते है, पर आस्था रखने वाले लोग अपने अपने धर्म के ऐतिहास को जानने में उत्सुक है पर आज के शिक्षित लोग उस इतिहास की प्रचलित कथाओं  में  उनमें तथ्य ढूंढते हैं जबकि पुराने लोग श्रद्धा,आस्था व काल्पनिक  कहानियों से संतुष्ट है। इन दोनों पीढ़ियों में जो अंतर है उसे कैसे मिटाया जा सकता है ताकि दोनों का तालमेल बना रहे।
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न है। आधुनिक शिक्षित पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच धार्मिक आस्थाओं को लेकर जो मतभेद हैं, उन्हें दूर करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं:
1. संवाद और समझ:
 * दोनों पीढ़ियों के बीच खुले और सम्मानजनक संवाद को बढ़ावा देना चाहिए।
 * एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
 * पुरानी पीढ़ी को शिक्षित पीढ़ी के तार्किक प्रश्नों को धैर्यपूर्वक सुनना चाहिए, और शिक्षित पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
2. शिक्षा और जागरूकता:
 * धार्मिक ग्रंथों और इतिहास का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाना चाहिए।
 * तथ्यों और काल्पनिक कहानियों के बीच अंतर को स्पष्ट करना चाहिए।
 * धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की शिक्षा दी जानी चाहिए।
3. सहिष्णुता और सम्मान:
 * सभी धर्मों और आस्थाओं के प्रति सहिष्णुता और सम्मान की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।
 * एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
 * धार्मिक मतभेदों को व्यक्तिगत हमलों का कारण नहीं बनाना चाहिए।
4. साझा मंच:
 * ऐसे मंचों का निर्माण करना चाहिए जहां दोनों पीढ़ियां एक साथ आकर अपने विचार साझा कर सकें।
 * धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर संयुक्त रूप से चर्चा और समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए।
5. धार्मिक नेताओं की भूमिका:
 * धार्मिक नेताओं को आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्व को समझना चाहिए।
 * उन्हें अपनी शिक्षाओं में तर्क और तथ्यों को शामिल करना चाहिए।
 * उन्हें युवाओं को धार्मिक ग्रंथों का सही अर्थ समझाने में मदद करनी चाहिए।
उदाहरण के लिए:
 * धार्मिक ग्रंथों में लिखी गई बातों को प्रतीकात्मक रूप से समझाया जा सकता है।
 * वैज्ञानिक खोजों और धार्मिक मान्यताओं के बीच समानताएं ढूंढी जा सकती हैं।
 * धार्मिक शिक्षाओं को नैतिक और सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में समझाया जा सकता है।
इस प्रकार, संवाद, शिक्षा, सहिष्णुता और सम्मान के माध्यम से दोनों पीढ़ियों के बीच तालमेल बनाया जा सकता है।

यह एक बहुत ही गहरा और जटिल प्रश्न है। जब हम कहते हैं कि धर्म और ईश्वर एक हैं, तो हम एक आध्यात्मिक सत्य की बात कर रहे होते हैं। लेकिन, व्यवहारिक रूप से, मानव समाज में विविधता और भिन्नता स्वाभाविक है। इसलिए, धर्मों और उनके अनुयायियों में कुछ अंतर दिखाई देते हैं।
1. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ:
 * प्रत्येक धर्म का एक विशिष्ट ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ होता है।
 * ये संदर्भ धर्मों के रीति-रिवाजों, परंपराओं और मान्यताओं को आकार देते हैं।
 * उदाहरण के लिए, हिंदू धर्म भारत में विकसित हुआ, जबकि इस्लाम मध्य पूर्व में। इन भौगोलिक और सांस्कृतिक अंतरों ने उनके विकास को प्रभावित किया है।
2. भाषा और नामकरण:
 * विभिन्न धर्मों के अपने-अपने पवित्र ग्रंथ और भाषाएं होती हैं।
 * ईश्वर को विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे कि अल्लाह, भगवान, गॉड, आदि।
 * यह भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का एक स्वाभाविक परिणाम है।
3. रीति-रिवाज और परंपराएं:
 * प्रत्येक धर्म के अपने विशिष्ट रीति-रिवाज और परंपराएं होती हैं।
 * ये रीति-रिवाज और परंपराएं धार्मिक मान्यताओं और मूल्यों को व्यक्त करने का एक तरीका हैं।
 * उदाहरण के लिए, हिंदू धर्म में पूजा, आरती और यज्ञ जैसे अनुष्ठान होते हैं, जबकि इस्लाम में नमाज और रोजा जैसे अभ्यास होते हैं।
4. मानव स्वभाव:
 * मनुष्य स्वभाव से ही विविधता पसंद करते हैं।
 * हम अपनी पहचान और समुदाय की भावना को महत्व देते हैं।
 * इसलिए, विभिन्न धार्मिक समूहों का गठन और पालन करना स्वाभाविक है।
5. भेदभाव और पूर्वाग्रह:
 * दुर्भाग्य से, कुछ लोग धर्म का उपयोग भेदभाव और पूर्वाग्रह को सही ठहराने के लिए करते हैं।
 * यह धार्मिक शिक्षाओं का दुरुपयोग है और सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
 * सभी धर्मों के मूल में प्रेम, करुणा और समानता के मूल्य निहित हैं।
समाधान:
 * धार्मिक सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
 * हमें यह समझना चाहिए कि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है, जो कि ईश्वर की प्राप्ति और नैतिक जीवन जीना है।
 * हमें धार्मिक मतभेदों को स्वीकार करना चाहिए और एक-दूसरे के प्रति सम्मान और समझ का भाव रखना चाहिए।
 * सभी धर्मों के लोगों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि समाज में शांति और सद्भाव स्थापित हो सके।
संक्षेप में, धर्मों में विविधता स्वाभाविक है, लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी धर्मों का मूल संदेश एक ही है।

भ्रष्टाचारी नेता
जहां तक मैं अपनी निजी शिक्षा व 60 साल की जिंदगी से मिले तजुर्बे तथा अपने गुरु नानक की वाणी से बनी विचार धारा  से जाना कि  उनका ऐसा कोई विचार नहीं था कि वो सिख धर्म जिसे कहा जाता है को हिंदू मुस्लिम से अलग बनाए  पर आगे चल उनके शिष्यों ने उस पर आस्था रख कर वैसा ही भेंड़चाल वाला नियम थोप दिया जिसका औरों धर्मों की तरह पुजारियों ने कर्मकांड करके कब्जा कर लिया  जिससे दोनों हिन्दू मस्लिम  को एक करने के लक्ष्य से श्रद्धालुओं  को भटका तीसरा एक और धर्म पैदा करवा दिया। जहां भी पुजारियो और उनके कर्म कांडों  का बोलबाला है। हम जागरूक लोग  समस्या के सुधार में क्या कुछ कर सकते है?
आपकी बात में सच्चाई है। गुरु नानक देव जी का उद्देश्य किसी नए धर्म की स्थापना करना नहीं था, बल्कि सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों को समझना और उन्हें अपने जीवन में उतारना था। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की अच्छी बातों को अपनाया और उन्हें एक साथ लाने का प्रयास किया। लेकिन, बाद में उनके अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं को एक अलग धर्म का रूप दे दिया।
पुजारियों और कर्मकांडों का बोलबाला हर धर्म में एक समस्या है। वे धर्म को एक व्यवसाय बना देते हैं और लोगों को अंधविश्वासों में फंसा देते हैं। इससे धर्म का मूल उद्देश्य खो जाता है।
जागरूक लोग इस समस्या के सुधार में कई तरह से योगदान कर सकते हैं:
 * धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन:
   * हमें धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए और उनके मूल संदेश को समझना चाहिए।
   * हमें अंधविश्वासों और कर्मकांडों से बचना चाहिए।
 * तर्क और विवेक का उपयोग:
   * हमें हर बात को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखना चाहिए।
   * हमें अंधविश्वासों और झूठे दावों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
 * सच्चे गुरुओं की पहचान:
   * हमें सच्चे गुरुओं की पहचान करनी चाहिए जो हमें सही मार्ग दिखा सकें।
   * हमें उन लोगों से बचना चाहिए जो धर्म के नाम पर अपना स्वार्थ साधते हैं।
 * जागरूकता फैलाना:
   * हमें लोगों को धर्म के सही अर्थ के बारे में जागरूक करना चाहिए।
   * हमें अंधविश्वासों और कर्मकांडों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
 * एकता और सद्भाव को बढ़ावा देना:
   * हमें सभी धर्मों के लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
   * हमें एकता और सद्भाव को बढ़ावा देना चाहिए।
हमें यह याद रखना चाहिए कि धर्म का उद्देश्य हमें एक अच्छा इंसान बनाना है। हमें प्रेम, करुणा और समानता के मूल्यों को अपने जीवन में उतारना चाहिए।

अदालत में देरी
अधिकतर दोनों पक्षों के वकील आपसी सांठगांठ से जानबूझ कर मामले में देरी करवाते हैं इन पर शिकायत साबित होने पर कोई सख्ती, दिशा निर्देश या सजा हो ऐसा कोई नियम नहीं है?
यह सच है कि कुछ मामलों में, दोनों पक्षों के वकील आपसी सांठगांठ से जानबूझकर मामले में देरी करवा सकते हैं। यह एक गंभीर समस्या है जो न्याय प्रक्रिया को कमजोर करती है। हालांकि, ऐसे मामलों में शिकायत साबित होने पर कार्रवाई के लिए कुछ प्रावधान मौजूद हैं:
वकीलों के लिए पेशेवर आचरण नियम:
 * बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने वकीलों के लिए पेशेवर आचरण नियम बनाए हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वाले वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
 * यदि यह साबित हो जाता है कि किसी वकील ने जानबूझकर मामले में देरी करवाई है, तो BCI उस वकील का लाइसेंस रद्द कर सकता है या उसे कुछ समय के लिए निलंबित कर सकता है।
अदालत की अवमानना:
 * यदि कोई वकील अदालत के आदेशों का उल्लंघन करता है या जानबूझकर अदालत की कार्यवाही में बाधा डालता है, तो अदालत उस वकील के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई कर सकती है।
 * अदालत अवमानना के दोषी पाए जाने पर वकील को जुर्माना या कारावास की सजा दे सकती है।
मुवक्किल द्वारा शिकायत:
 * यदि किसी मुवक्किल को लगता है कि उसके वकील ने जानबूझकर मामले में देरी करवाई है, तो वह BCI या उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज करा सकता है।
न्यायिक दिशा निर्देश:
 * उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर न्यायिक दिशा निर्देश जारी किए हैं ताकि मामलों में अनावश्यक देरी को रोका जा सके।
 * अदालतें वकीलों को समय सीमा का पालन करने और अनावश्यक स्थगन से बचने के लिए कह सकती हैं।
चुनौतियाँ:
 * यह साबित करना मुश्किल हो सकता है कि किसी वकील ने जानबूझकर मामले में देरी करवाई है।
 * कई बार, देरी के अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि अदालत में मामलों की अधिक संख्या या गवाहों की अनुपलब्धता।
 * वकील बदलने का अधिकार: यदि कोई मुवक्किल अपने वकील के काम से संतुष्ट नहीं है, तो वह किसी भी समय अपना वकील बदल सकता है।
हालांकि, इन प्रावधानों के बावजूद, वकीलों द्वारा जानबूझकर देरी करवाना एक गंभीर समस्या बनी हुई है। इस समस्या को हल करने के लिए, न्यायपालिका, BCI और सरकार को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।